साहित्य इत्यादि की पत्रिकाओं में मैंने अब तक जो लिखा पाठकों को सोचकर नहीं लिखा। जो लिख सकता था वही लिखा। इसे कौन पढ़ेगा? या कोई पढ़ेगा! के सुनसान में यह लिखा हुआ छोड़ देता था। साइकिल में यह सोचकर लिखता हूँ कि बच्चे पढ़ेंगे। साइकिल ने मुझे इस उम्र में, पास और दूर के बच्चों तक पहुँचने में मदद की।